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अबकी बार, किसकी सरकार – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news…

लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर का मतदान अभी शेष है, लेकिन विभिन्न स्तरों पर आकलन और विश्लेषण शुरू हो गए हैं कि अंततः सरकार किसकी बन सकती है? राजनीतिक तौर पर भी बिसात बिछाई जा रही है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जनादेश की तारीख 23 मई से दो दिन पहले ही विपक्षी दलों की बैठक बुलाई है। उसमें ममता बनर्जी, मायावती और अखिलेश यादव आदि शिरकत नहीं करेंगे। यानी विपक्ष के प्रमुख तीन राजनीतिक दल कांग्रेस की सियासत से फिलहाल अलग रहना चाहते हैं। महागठबंधन इन चुनावों की प्रस्तावना थी, लेकिन वह सबसे बड़ी नाकामी साबित हुई। विपक्षी एकता में गहरी दरारें अब भी स्पष्ट हैं, जबकि जनादेश लगभग तय हो चुका है। ममता का सुझाव था कि बैठक 23 मई के बाद बुलाई जाए और तब तक मतगणना पर ही फोकस  किया जाए। मायावती और अखिलेश दोनों ही चुनाव के दौरान कांग्रेस के कटु आलोचक रहे। वे तब तक कांग्रेस के पाले में नहीं जाएंगे, जब तक स्पष्ट न हो जाए कि सपा-बसपा गठबंधन को कितनी सीटें मिल रही हैं। अंततः यूपीए के साथ जुड़ना अथवा उसका समर्थन लेना ही विपक्ष की नियति है। विपक्षी खेमे में ही तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव अपने ‘संघीय मोर्चे’ के साथ सक्रिय हैं। वह गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस मोर्चा बनाने के पक्षधर हैं। बेशक सरकार बनाने को समर्थन किसी का भी लिया जाए, लेकिन सरकार का संचालन ‘संघीय मोर्चा’ ही करे। चुनाव से पूर्व और समापन होने तक केसीआर कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं, लेकिन अभी तक ‘संघीय मोर्चे’ के पक्ष में कोई ठोस स्वीकृति उभर कर सामने नहीं आई है। अलबत्ता चंद्रशेखर राव की महत्त्वाकांक्षाएं यथावत हैं कि केंद्र सरकार का प्रारूप और उसके समीकरण ऐसे बनें, जिसमें उन्हें कमोबेश उपप्रधानमंत्री का पद मिल सके। हालांकि तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट भी सुनाई दे रही है, लेकिन उसके लिए सार्थक कोशिशें नगण्य हैं। दरअसल यह तीसरे मोर्चे की सरकार वाला दौर नहीं है। तीसरे मोर्चे की सरकारें उसी स्थिति में बनी हैं, जब कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी और उसने मोर्चे को बाहर से समर्थन दिया था। 1990 में चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी के 60 ही सांसद थे, लेकिन कांग्रेस ने समर्थन देकर सरकार बनवाई। चंद्रशेखर मात्र 4 महीने ही प्रधानमंत्री रह सके। 1996 में संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी। उसमें जनता दल सबसे बड़ा घटक था। उसके 46 सांसद ही थे, लेकिन पहले एचडी देवेगौड़ा और फिर इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने। हालांकि कांग्रेस ने दोनों सरकारें 11-11 महीने ही चलने दीं। लिहाजा एक कथन लगभग सूत्रवाक्य बन गया कि तीसरा मोर्चा टूटने के लिए ही बनता है और टूटने के बाद नए सिरे से बनाने की कोशिशें की जाती हैं, ताकि वह फिर टूट सके। भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की यही नियति रही है। सबसे ताकतवर पक्ष भाजपा का है। विरोधी और चुनाव विश्लेषक उसे 150 से लेकर 240 तक सीटें दे रहे हैं। हम इसे 23 मई तक छोड़ भी दें, तो शरद पवार सरीखे विपक्षी नेता और चुनाव पंडितों का आकलन है कि भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरेगी और एनडीए गठबंधन बहुमत के सबसे करीब होगा, क्योंकि वह चुनाव-पूर्व का गठबंधन है, लिहाजा राष्ट्रपति सरकार बनाने का प्रथम आमंत्रण उन्हें ही देंगे। यह संवैधानिक बाध्यता नहीं, बल्कि परंपरा रही है और सर्वोच्च न्यायालय का विचार भी है। हमने नरेंद्र मोदी के रूप में प्रथम प्रधानमंत्री देखा है, जो चुनाव प्रचार के दौरान ही सरकार बनाना तय घोषित कर रहा है। यह दीगर है कि राजनीतिक दल बहुमत प्राप्त करने का दावा करते रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री जनादेश से पूर्व ही सरकार बनने का कभी भी दावा नहीं करते। उसे जनता के विवेक और विशेषाधिकार पर छोड़ते रहे हैं। यह भी गौरतलब होगा कि 2014 में 44 सीटों तक सिमटने वाली कांग्रेस के हिस्से इस बार कितनी सीटें आती हैं। बहरहाल यही लोकतंत्र का गुण है कि जनादेश से पहले ही भावी सरकार पर सार्वजनिक चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। फिलहाल इन्हीं चर्चाओं का आनंद उठाया जाए।

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(साभार :  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल )

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