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विश्वकर्मा पुराण…

पृथ्वी अपनी गति से अपने मध्य बिंदु के आसपास परिक्रमा करती रहती है और उसके कारण से दिन और रात होते हैं। इस रात्रि को नित्य प्रलय कहा जाता है। इस प्रकार से अपनी तीन सौ साठ दिन और रात्रि मिलकर एक वर्ष होता है। जब अपने तीन सौ साठ वर्ष हों, तब देवताओं का मात्र एक ही वर्ष गिनने में आता है। देवताओं का इस प्रकार से बारह हजार, चौबीस हजार, छत्तीस हजार, अड़तालीस हजार वर्ष के प्रमाण से सतयुग आदि चार युगों की कल्पना की गई है…
समस्त विश्व को धारण करने वाले तथा सकल विश्व के कर्ता ऐसे देवादिदेव प्रभु विश्वकर्मा की जय हो। जय हो। जय हो। आपके प्रत्येक रोम में लाखों विश्वों के निवास से समस्त जगत का शासन करने वाले ऐसे निर्गुण अथवा सगुण वह देवादिदेव मुझे सब प्रकार के सुख संपत्तियों के देने वाले हों। सूतजी बोले, हे ऋषियो! आदि सृष्टि के आरंभ के बाद प्रथम काल के अंत में जब समस्त पृथ्वी पर प्रलय होने को था। उस प्रलय काल के भयंकर तूफान से तथा भूकंपाति के कारण से अत्यंत डोलती पृथ्वी के लिए जिनको भय उत्पन्न हुआ, ऐसे ही कई ऋषि-मुनियों के ऊपर की गाथाओं का गायन किया हुआ है। ऋषि बोले, हे सूतजी! तपस्या के प्रभाव के कारण से सब प्रकार की संपत्तियां जिनके चरणों में दासी की तरह नित्य स्मरण करती हैं, फिर भी तप को ही सब प्रकार के धनों में जिन्होंने मुख्य गिना है। ऐसे साक्षात तपस्पी इन ऋषि- मुनियों ने विश्वकर्मा की कौन से कारण से प्रार्थना की। अतः उनकी तुच्छ गिनी हुई ऐसी सुख संपत्तियों के लिए जो प्रार्थना का कारण है और इस तरह जो आपने कहा वह बात हमको विपरीत लगती है। अतः तुच्छ और नाशवंत ऐसी इन संपत्तियों को तो ऋषि क्षुद्र मानकर उसका तिरस्कार करते हैं तथा दूर से ही उसका त्याग करते थे। फिर भी तपस्या छोड़कर प्रभु की इस प्रकार प्रार्थना करने का कारण क्या था। आगे की सारी बात आप हमें बताने की कृपा करें। ऋषियों के इस प्रकार के वचन सुनकर सूतजी बोले, हे ऋषियो! इस विश्व में सब पदार्थ गतिमान हैं। इसमें आपने जिसके ऊपर निवास किया है। ऐसी ये पृथ्वी अपनी गति से अपने मध्य बिंदु के आसपास परिक्रमा करती रहती है और उसके कारण से दिन और रात होते हैं। इस रात्रि को नित्य प्रलय कहा जाता है। इस प्रकार से अपनी तीन सौ साठ दिन और रात्रि मिलकर एक वर्ष होता है। जब अपने तीन सौ साठ वर्ष हों, तब देवताओं का मात्र एक ही वर्ष गिनने में आता है। देवताओं का इस प्रकार से बारह हजार, चौबीस हजार, छत्तीस हजार, अड़तालीस हजार वर्ष के प्रमाण से सतयुग आदि चार युगों की कल्पना की गई है। इन सभी वर्षों का जो एक लाख बीस हजार वर्ष का मानने में आता है और उतने ही समय में अपने चार करोड़ बत्तीस लाख वर्ष व्यतीत हो जाते हैं। इन चार युगों को महायुग अथवा चौकड़ी कहा जाता है। दूसरे महायुग की शुरुआत हो, उसके बीच में चार हजार देवताओं के वर्ष व्यतीत हो जाते हैं। इस बीच के समय को नैमित्तिक प्रलय कहा जाता है और उस समय में ये सारी पृथ्वी जल में समा जाती है तथा पृथ्वी के ऊपर के तमाम जीव, प्राणी, मनुष्य, वृक्ष, औषधि आदि का विनाश होता है। हे ऋषियो! आद्र सृष्टि की शुरुआत के बाद जब प्रथम नैमित्रिक प्रलय होने वाली थी, उस समय समस्त पृथ्वी पर हाहाकार हो गया भयंकर घड़-घड़ाहट के साथ में प्रलयकाल के उडं़चासों पवन एक ही साथ में (आंधी) वनटोरिया का रूप धारण करके रहने लगे। दिशाओं में धूल की ढेरियों से आकाश में भयंकर अंधकार छा गया तथा वृक्ष, मकान एवं पर्वत टूटने और उड़ने लगे तथा समुद्र में ज्वार भाटाओं के कारण बड़ी-बड़ी लहरें उछलने लगीं एकाएक आए हुए इस भयंकर आंधी के समान पवन के तूफान से सब प्रजाएं दुखी हो गईं।
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(साभार :  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल )

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